प्रेमनगर थाना पुलिस पर लगाए गए गंभीर आरोपों के मामले में न्यायालय ने प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का मामला मानते हुए विधिवत अन्वेषण के आदेश दिए हैं। द्वितीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, देहरादून संजीव कुमार ने 10 सितंबर 2026 को धारा 175(3) बीएनएसएस के तहत प्रार्थनापत्र स्वीकार करते हुए मामले की निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए।
मामले में शिकायतकर्ता प्रवीण सेमवाल की ओर से तत्कालीन प्रेमनगर थानाध्यक्ष नरेश सिंह राठौर, एसआई सतेंद्र सिंह, उपनिरीक्षक शोभा मेहता और महिला कांस्टेबल सुशीला समेत अन्य के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोपों में मारपीट, बिना मुकदमा दर्ज किए थाने बुलाना तथा कथित तौर पर 20 लाख रुपये का समझौतानामा लिखवाने के लिए दबाव बनाने की बात कही गई है।
शिकायतकर्ता के अनुसार वह करीब पांच वर्षों तक यशपाल सिंह तंवर के प्रतिष्ठान में अकाउंटेंट के रूप में कार्यरत रहे। जनवरी 2026 में नौकरी समाप्त होने के बाद दो माह का वेतन नहीं मिलने तथा बाद में उन पर नौकरी के दौरान करीब 20 लाख रुपये की चोरी का आरोप लगाए जाने का दावा किया गया।
आरोप है कि 10 मार्च 2026 को प्रवीण सेमवाल को प्रेमनगर थाने बुलाया गया, जहां उनके साथ कथित रूप से मारपीट की गई और 20 लाख रुपये की देनदारी स्वीकार करने वाला समझौतानामा लिखने का दबाव बनाया गया। शिकायतकर्ता पक्ष ने इस संबंध में गृह सचिव, जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक समेत संबंधित अधिकारियों को शिकायतें भी दी थीं।
इसके बाद 9 अप्रैल 2026 को प्रवीण सेमवाल और उनकी पत्नी प्रतीक्षा सेमवाल को उनकी दुकान से पुलिस द्वारा थाने ले जाने और वहां कथित मारपीट किए जाने के आरोप लगाए गए। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि प्रवीण के साथ लाठी और बेल्ट से मारपीट की गई तथा पत्नी द्वारा बचाव का प्रयास करने पर उनके साथ भी दुर्व्यवहार एवं मारपीट की गई।
मामले में यह भी उल्लेखनीय है कि यशपाल सिंह तंवर की शिकायत पर प्रवीण सेमवाल के खिलाफ 19 अप्रैल 2026 को अपराध संख्या 80/26 में चोरी एवं आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। न्यायालय ने इस तथ्य पर भी सवाल उठाया कि यदि संज्ञेय अपराध की सूचना पहले से थी, तो प्राथमिकी दर्ज करने से पूर्व पूछताछ एवं अन्य कार्रवाई किस आधार पर की गई।
न्यायालय ने उपलब्ध शिकायती पत्र, कथित समझौतानामा, व्हाट्सऐप संवाद के प्रिंटआउट सहित अन्य दस्तावेजों का अवलोकन किया। आदेश के अनुसार मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल वीडियो, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, मोबाइल फोन रीसेट किए जाने से जुड़े तथ्य तथा मेडिकल रिपोर्ट की जांच आवश्यक है।
न्यायालय ने उपलब्ध सामग्री के समग्र परीक्षण के आधार पर प्रथम दृष्टया भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2), 119(2), 127(2), 133, 351(2) और 352 के तहत संज्ञेय अपराध का गठन होना परिलक्षित माना है।
चूंकि मामले में पुलिस अधिकारियों के नाम भी आरोपी के रूप में सामने आए हैं, इसलिए न्यायालय ने निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए निरीक्षक स्तर से ऊपर के पुलिस अधिकारी से अन्वेषण कराने के निर्देश दिए हैं। वर्तमान में नरेश सिंह राठौर को पटेलनगर कोतवाली की जिम्मेदारी सौंपे जाने की जानकारी भी सामने आई है।
प्रार्थी पक्ष की ओर से अधिवक्ता आरके सकलानी ने न्यायालय में पैरवी की।