आसानी से मिल रहा है शिकार, इसलिए आलसी हो रहा ‘राजा’

हल्द्वानी। कार्बेट टाइगर रिजर्व के बाघों के व्यवहार में बदलाव हो रहा है। कार्बेट पार्क में गुज्जर के पशुओं के आसान शिकार मिलने से बाघिन को छोड़ने वाले शावकों के व्यवहार में बदलाव हो रहा है, उनमें अपनी टेरिटरी के लिए आपसी संघर्ष भी कम हो रहा है। यह खुलासा एनटीसीए की मैनेजमेंट इफेक्टिवनेस इवैल्यूएशन इन टाईगर रिज़र्व्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में हुआ है। इसमें बाघ के व्यवहार में आ रहे बदलाव के कारणों का जिक्र है। यही नहीं तेंदुओं के व्यवहार में बदलाव को भी वनाधिकारियों ने महसूस किया है,

मैनेजमेंट इफेक्टिवनेस इवैल्यूएशन इन टाईगर रिज़र्व्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में तत्काल कदम वाले प्वाइंट में कहा गया है
है कि कार्बेट पार्क के कोर जोन में चराई की अनुमति नहीं है। पर कार्बेट पार्क के बफर में 57 गुज्जर परिवार रहते हैं। करीब एक हजार पशु जंगल पर निर्भर हैं। यह पशु बाघों के लिए आसान शिकार है, जिसके कारण उनके व्यवहार में बदलाव आ रहा है। जब शावक बड़े होने के बाद बाघिन को छोड़ते हैं, तो वे खुद शिकार करते हैं। पर आसानी से पशु मिल रहे हैं, ऐसे में उनमें अपनी सीमा नियंत्रण करने का एक खास गुण होता और उसके लिए आपसी संघर्ष करते हैं वह भी कम हो रहा है। आसान शिकार पर अधिक निर्भर हो रहे हैं। ऐसे में संबंधित मामले की अधिक जांच कि जरूरत है जिसके पर आगे भविष्य में बेहतर प्रबंधन किया जा सके।पश्चिम वृत्त में स्थिति और खराब रिपोर्ट में केवल टाइगर रिजर्व का जिक्र है। पर पश्चिम वृत्त के अधीन आने वाले वन प्रभागों में है। कार्बेट से सटे रामनगर, तराई पश्चिम वन प्रभाग के अलावा हल्द्वानी, तराई पूर्वी ,तराई केंद्रीय वन प्रभाग में बाघों की संख्या 216 है, यहां पर एक हजार से अधिक गुज्जर, गोठ के डेरे हैं। जिनके सैकड़ों पशु हैं। इसके अलावा स्थानीय ग्रामीणों के पशु भी जंगल में चरते हैं। ऐसे में यह बदलाव संबंधित प्रभागों में भी हो सकता है।

बाघों की संख्या बढ़ने से तेंदुओं के व्यवहार में बदलाव ?

हल्द्वानी। प्रदेश में बाघों की संख्या में इजाफा हुआ है, राज्य में 2018 में बाघों की संख्या 442 थी जो बढ़कर 560 हो गई। जबकि जंगल का एरिया बढ़ने की जगह कम हुआ है। बाघों की संख्या बढ़ने से तेंदुओं के व्यवहार में बदलाव होने का अंदेशा वनाधिकारियों को है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक बाघ अपनी एक सीमा बनाता है. इसमें दूसरे बाघ या तेंदुओं की उपस्थिति को बर्दाश्त नहीं करता है। क्योंकि बाघों की संख्या बढ़ी है, ऐसे में तेंदुओं को जंगल की सीमा छोड़ने की नौबत आ रही है।

क्या कहते हैं अधिकारी
हल्द्वानी। तराई पश्चिम वन प्रभाग डीएफओ प्रकाश आर्य कहते हैं कि जंगल के बाहर झाड़ी, गन्ने के खेत में तेंदुओं की उपस्थिति बढ़ रही है। जहां भी वन जैसे स्थिति मिल रही है, वहां पर तेंदुए की रिपोर्ट हो रहे हैं। उनके प्रभाग में जसपुर, काशीपुर, पीरूमदारा समेत अन्य इलाकों में तीन महीने में 50 से अधिक तेंदुए के आबादी वाले इलाके में आने शिकायत आ चुकी है। यह संख्या तुलनात्मक तौर पर ज्यादा है। इसका एक कारण बाघों बढ़ना( पहले 23 थे अब 53 बाघ हैं) भी हो सकता है। इसके कारण तेंदुए बाहर आ रहे हों। तेंदुओं की सुरक्षा को लेकर भी चुनौती बढ़ी है। आठ महीने में पांच तेंदुओं की मौत रोड पार करते समय वाहन की टक्कर से हो चुकी है। मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं प्रसन्न पात्रो कहते हैं कि तेंदुओं के व्यवहार में बदलाव को लेकर अभी कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है, यह एक अंदेशा हो सकता है। ऐसे में अधिक और पुष्ट जानकारी के लिए बाघों की संख्या बढ़ने से पड़ने वालों के प्रभावों के अध्ययन के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा जाएगा। वहीं, कार्बेट पार्क निदेशक धीरज पांडे से बात करने का प्रयास किया गया, लेकिन पक्ष नहीं मिल सका है।

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