हरिद्वार: वर्तमान समय में अधिवक्ताओं के विरुद्ध हिंसा, मारपीट, जानलेवा हमले, हत्या, अपहरण, धमकी, उत्पीड़न तथा उनकी निजी एवं व्यावसायिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं लगातार चिंताजनक होती जा रही हैं। हाल ही में बागेश्वर निवासी अधिवक्ता धीरेंद्र सिंह परिहार 17 अक्टूबर 2026 से लापता थे। उनकी माता श्रीमती नंदी परिहार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर अपने पुत्र की तलाश की गुहार लगाई थी। वहीं, बागेश्वर के अधिवक्ताओं, व्यापारियों एवं स्थानीय नागरिकों ने प्रदर्शन और चक्का जाम कर उनकी शीघ्र तलाश एवं मामले का खुलासा करने की मांग की थी। 3 नवंबर 2026 को धीरेंद्र सिंह परिहार का शव नदी गांव रोड स्थित दिगर पाटल, बागेश्वर में बरामद हुआ। इस घटना सहित अधिवक्ताओं के खिलाफ लगातार सामने आ रही आपराधिक घटनाओं को देखते हुए हरिद्वार के अरुण भदोरिया एडवोकेट, कमल भदोरिया एडवोकेट, श्रीमती सुमेधा भदोरिया एडवोकेट पत्नी श्री अनिरुद्ध प्रताप सिंह, चेतन भदोरिया (एलएलबी अध्यनरत), शाहनवाज मलिक (एलएलबी अध्यनरत) एवं श्रीमती रेखा पांडे एडवोकेट ने उत्तराखंड राज्य मानवाधिकार आयोग में याचिका दाखिल कर प्रदेश में अधिवक्ता संरक्षण विधेयक लागू करने की मांग की है।
याचिका में बताया गया है कि अधिवक्ताओं को अपने जान-माल की सुरक्षा के लिए कई बार पुलिस एवं संबंधित अधिकारियों से अपेक्षित सहायता नहीं मिल पाती है। अनेक अवसरों पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में पैरवी करने, प्रभावशाली व्यक्तियों अथवा आपराधिक तत्वों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने, विवादों में विधिक सलाह देने और अपने मुवक्किल के अधिकारों की पैरवी करने के कारण अधिवक्ताओं को धमकियों एवं हिंसा का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में झूठी एवं मनगढ़ंत शिकायतों के माध्यम से उन्हें मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने का प्रयास किया जाता है, ताकि वे अपने विधिक कर्तव्यों का स्वतंत्र रूप से निर्वहन न कर सकें। न्यायालय परिसर, न्यायालय के बाहर अथवा न्यायालय आते-जाते समय अधिवक्ताओं के साथ मारपीट और जानलेवा हमले की घटनाएं भी सामने आती रही हैं।

इसके अतिरिक्त अधिवक्ताओं की हत्या, अपहरण, गंभीर शारीरिक चोट पहुंचाने, कार्यालयों, चैंबर, आवास एवं वाहनों में तोड़फोड़ तथा आगजनी कर संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं भी चिंता का विषय हैं। याचिका में कोटद्वार के एक वरिष्ठ अधिवक्ता की हत्या का भी उल्लेख किया गया है। अधिवक्ताओं के साथ-साथ उनके परिवार के सदस्यों को धमकाने और मानसिक एवं सामाजिक रूप से प्रताड़ित करने की घटनाओं पर भी चिंता जताई गई है। शिकायतों के बावजूद समय पर पुलिस सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराने और कानूनी कार्रवाई में लापरवाही के कारण अधिवक्ता समुदाय में भय का माहौल बना हुआ है, जिससे वे स्वतंत्र रूप से अपने मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं।
याचिका में कहा गया है कि उत्तराखंड एक पर्वतीय एवं मैदानी भौगोलिक परिस्थितियों वाला राज्य है, जहां देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर सहित सभी जनपदों में न्यायालयों एवं तहसीलों में बड़ी संख्या में अधिवक्ता न्यायिक एवं विधिक कार्य करते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश में प्रभावी अधिवक्ता संरक्षण कानून बनाया जाना आवश्यक है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि देश के अन्य राज्यों में कर्नाटक और राजस्थान में वर्ष 2023 तथा तेलंगाना में वर्ष 2026 में अधिवक्ता संरक्षण कानून बनाया जा चुका है। इसी आधार पर उत्तराखंड में भी ऐसा कानून लागू करने की आवश्यकता जताई गई है।
अधिवक्ता संरक्षण कानून के प्रस्तावित प्रावधानों के संबंध में याचिका में मांग की गई है कि अधिवक्ताओं के विरुद्ध हिंसा को विशेष अपराध घोषित किया जाए तथा उनकी निजी एवं व्यावसायिक संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। अधिवक्ताओं को डराने, दबाव बनाने अथवा उनके पेशेवर कार्यों में बाधा डालने के उद्देश्य से की जाने वाली दुर्भावनापूर्ण शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर झूठी शिकायत करने वालों के विरुद्ध कठोर दंड का प्रावधान किया जाए। अधिवक्ताओं को आवश्यकता पड़ने पर तत्काल पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए तथा गंभीर आपराधिक मामलों एवं हत्या की घटनाओं की जांच वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की निगरानी में विशेष जांच व्यवस्था के तहत कराई जाए। इसके साथ ही प्रत्येक जनपद में जिला न्यायाधीश अथवा उनके नामित प्रतिनिधि, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जिला बार एसोसिएशन के प्रतिनिधि एवं अन्य उपयुक्त सदस्यों को शामिल करते हुए शिकायत निवारण समिति गठित करने की मांग की गई है। पीड़ित अधिवक्ताओं को आर्थिक सहायता एवं मुआवजा देने, उनके परिवार के सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा राज्य स्तर पर 24 घंटे संचालित अधिवक्ता सुरक्षा हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल स्थापित करने जैसे प्रावधान भी शामिल करने का आग्रह किया गया है।
अंत में भदोरिया एडवोकेट एसोसिएट की ओर से राज्य मानवाधिकार आयोग से मांग की गई है कि राज्य सरकार को एक व्यापक एवं प्रभावी उत्तराखंड अधिवक्ता संरक्षण विधेयक तैयार कर उसे राज्य विधानसभा में प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए जाएं। विधेयक का प्रारूप तैयार करते समय कर्नाटक, राजस्थान एवं तेलंगाना के अधिवक्ता संरक्षण कानूनों का तुलनात्मक अध्ययन कर उत्तराखंड की भौगोलिक, सामाजिक एवं न्यायिक परिस्थितियों के अनुरूप प्रभावी प्रावधान शामिल किए जाएं। साथ ही, जब तक प्रदेश में अधिवक्ता संरक्षण कानून लागू नहीं हो जाता, तब तक अधिवक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरिम दिशा-निर्देश जारी करने एवं आवश्यक पुलिस सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराने के निर्देश राज्य सरकार को दिए जाने की मांग भी याचिका में की गई है।