वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 बनने के बाद अब उत्तराखंड वक्फ बोर्ड को हालात बदलने की उम्मीद है. पिछले 24 सालों से उत्तराखंड वक्त बोर्ड अपने बदहाल हालातों से जूझ रहा है. जबकि, प्रदेश में वक्फ बोर्ड के पास 5 हजार करोड़ से ज्यादा की संपत्ति मौजूद है. लिहाजा, केंद्रीय वक्फ एक्ट के संशोधन के बाद उत्तराखंड वक्फ बोर्ड भी अपने अच्छे दिनों की उम्मीद कर रहा है.
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद साल 2003 में ‘उत्तराखंड वक्फ बोर्ड’ गठित किया गया था. इसे उत्तर प्रदेश वक्फ बोर्ड से अलग कर बनाया गया था. उस समय बंटवारे के दौरान उत्तर प्रदेश से 2,032 सुन्नी और 21 शिया वक्फ संपत्तियां मिली थी. इसके अलावा वक्फ बोर्ड के पास 2,146 औकाफ और उनकी कुल 5,388 संपत्तियां हैं.
हैरानी की बात ये है कि पिछले 22 सालों से उत्तराखंड वक्फ बोर्ड की जिम्मेदारियां केवल चार नियमित कर्मचारियों के कंधों पर है. केंद्र सरकार ने हाल ही में वक्फ संपत्तियों के रखरखाव उनके इस्तेमाल और पारदर्शिता के लिए कानून में संशोधन किया है, लेकिन उत्तराखंड में इन संपत्तियों के रखाव की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने वाले कर्मचारी का प्रस्ताव अभी तक ठंडे बस्ते में है.
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के ये 4 पद निरीक्षक, रिकॉर्ड कीपर, कनिष्ठ लिपिक और अनु सेवक के हैं, लेकिन तब से लेकर अब तक बोर्ड में इसके अलावा और कोई भर्ती नहीं की गई. इन चारों कर्मचारी के कंधों पर वक्फ बोर्ड की पूरी जिम्मेदारी है. साल 2003 में उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के गठन के बाद बोर्ड ने 26 कर्मचारियों की भर्ती का प्रस्ताव तैयार किया, लेकिन यह प्रस्ताव अब तक केवल कागजों से बाहर नहीं आ पाया है.
बोर्ड ने शासन को कई बार इस प्रस्ताव पर अमलीजामा पहनाने के लिए रिमाइंडर भेजे, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाई. ऐसा नहीं है कि यह प्रस्ताव केवल किसी एक राजनीतिक दल के समय ही शासन तक पहुंचा हो, बल्कि हर राजनीतिक दल ने इस मामले में उदासीनता ही दिखाई है. हालांकि, इस दौरान नियमों में कुछ संशोधन जरूर किए गए.
साल 2021 में उत्तराखंड में बीजेपी सरकार ने सितंबर 2022 तक वक्फ बोर्ड को आईएएस अधिकारी डॉक्टर अहमद इकबाल के भरोसे बतौर प्रशासक रखा. वहीं, सितंबर 2022 में बीजेपी ने अपने फायर ब्रांड नेता शादाब शम्स को वक्फ बोर्ड की जिम्मेदारी दी जो कि अब तक उन्हीं के पास है.